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अहंकार को मरने दो कि फिर वापिस आना नहीं होगा

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जब कोई तामीर बेतखरीब हो सकती नहीं ।

खुद मुझे अपने लिए बरबाद होना चाहिए ।।

इस जगत में बिना मिटाए कुछ भी नहीं बनता, जब कोई तामीर बेतखरीब हो सकती नहीं, जब कोई चीज बन ही नहीं सकती बिना मिटाये, बिना विध्वंस के सृजन होता ही नहीं तो खुद मुझे अपने लिए बरबाद होना चाहिए, मिटना होगा यदि स्वयं को पाना है, जलना होगा तुम्हे अगर ज्योतिर्मय हो जाना है, बीज मिटता है तो वृक्ष होता है, नदी मिटती है तो सागर हो जाती है, जिस घडी तुम मिटने को राजी हो गये, उसी घडी तुम्हारे भीतर परम का आविर्भाव हो जाता है, वह फिर कभी नहीं मिटता, तुम तो क्षणभंगुर हो, पानी के बुलबुले हो, बचे भी तो कितनी देर बचोगे? मौत तो आ ही जाएगी, तो फिर अपने हाथ से छलांग क्यों नहीं लगा लेते, जो स्वयम मर जाता है वाही ध्यान को उपलब्ध होता है,  समाधि आत्म मरण है, मरने से कोई शारीरिक मरने की बात नहीं है, शरीर तो बार बार मरा है, और फिर फिर तुम वापिस आ गये, इस बार अहंकार को मरने दो कि फिर वापिस आना नहीं होगा, फिर तुम सुगत हो जाओगे, अर्थात जो ठीक ठीक चला जाता गया, फिर वापिस नहीं आता|

—ओशो—

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