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तुम मेरी प्रशंसा से कुछ भी नहीं पा सकते हो

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ओशो : तुम मेरी प्रंशसा मत करो, तुम मेरी प्रशंसा से कुछ भी नहीं पा सकते हो, मुझे धोखा देना असंभव है, मैं किसी तरह की स्तुति में भरोसा नहीं करता, तुम जैसे हो, मुझे स्वीकार हो, मगर यह ‘खोटे’ वगैरह होने का अहंकार मत घोषित करो, ये तरकीबें नहीं, खोटे हो, तो ठीक, क्या हर्जा? कौन खोटा नहीं है? मगर खोटे की घोषणा करके तुम इस भ्रांति में न पड़ो कि तुम दूसरो से विशिष्ट हुए जा रहे हो, वही मोह भीतर छिपा है|

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